‘अघोर’ का वास्तविक अर्थ – सनातन व्याख्या

अघोर की सनातन व्याख्या - अघोर तंत्र
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‘अघोर’ का वास्तविक अर्थ – सनातन व्याख्या

‘अघोर’ – यह शब्द बाजारू तांत्रिकों और टीवी सिनेमा वालों के कारण अत्यंत विकृत छवि के साथ समाज में व्याप्त हो गया है. ‘अघोरी’ यानी भयानक कपालिका, जो बड़ी- बड़ी जटाओं, काले चोंगे, हड्डियों एवम खोपड़ियो की माला पहनने वाला एक साधक, जो चिता से  मानव मांस का भक्षण करता है. इनको ‘अघोरी’ या ‘अघोर’ का साधक कहा जाता है और सब समझते भी ऐसा है. फलस्वरूप समाज के अनपढ़, शास्त्रहीन, ज्ञानहीन अपराधी इस प्रकार की वेशभूषा बनाकर समाज में लोगो का भयादोहन करते है और अघोर तन्त्र की क्रिया करके मनोवांछित फल दिलाने का प्रलोभन देकर नरबली तक करवा देते हैं. इस तरह ‘अघोर’ और ‘अघोरी’ दोनों ही मुरमुरी लानेवाले भयानक वीभत्स भाव में सबके मस्तिष्क में व्याप्त हो गये हैं.

अघोर का वास्तविक अर्थ क्या है? सनातन धर्म में अघोर की व्याख्या

‘अघोर’ का अर्थ ‘मलविहीन’ होता है यानि निर्मल. तन्त्र में केवल परमात्म तत्व जो सबका सार तेजोमय प्रकश से भी लाखों गुणा सूक्ष्म निराकार परमात्मा है, उसी को ‘निर्मल’ कहा जाता है. वह परमतत्व जो सबका ‘सार’ है. अनंत तक व्याप्त है. परम सूक्ष्म और संचेतन है. वही निर्मल है, कोई भौतिक अस्तित्व यहाँ तक कि प्रकाश आदि भी निर्मल नहीं है. वह सबका अस्तित्व सार है. यह ब्रह्माण्ड उसी से अणु रूपा में उत्पन्न होता है, जो उसकी धाराओं से बना एक भंवर मात्र है. इसमें कोई नया तत्व नहीं बनता.लेकिन परमाणु रूप में परिवर्तित होते ही, उसमें स्व का अहंकार उत्पन्न हो जाता है और यही से वो अणु मल या निगुणा, प्रवृति बंधन; क्रिया आदि में बंध जाता है.

अघोर का वास्तविक सनातन अर्थ
अघोर का अर्थ वह नहीं जो आप अपने मस्तिष्क में बनाये बैठे हैं.

पाखंड से बचिए – अघोर वह नहीं जो आप समझ रहे हैं

इस मार्ग का कोई साधक अपने आप को प्रकट नहीं करता. जो कैमरे के सामने चिता से मांस निकालकर खा रहा है, न तो वह कोई अघोरी है, न साधक. वह मांस भी बकरे की रान है,  जो आपके सामने भयानक वेशभूषा में बैठा भय फैला रहा है, वह भी कोई पाखंडी है. उसे पुलिस के हवाले कीजिये कि वह करता क्या  है ? उसके ड्रामा से डरने की जरूरत नहीं है. वह ‘अघोरपंथ’ का कोई साधक तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि तीन बरस जंगल पहाड़ों की खाक छानने के बाद भी इनमें से एक मिल पाए, जो नेपाल के एक पहाड़ पर जंगल में रहते थे. ये भी छुपकर ही साधना कर रहे थे, पर नीचे गाँव था और इनकी चर्चा फ़ैल गयी. इनकी समस्या यह थी कि 20 दिन में पहाड़ पर चढ़कर लोग उनसे अपनी खोई गाय, भैंस के बारे में जानने आ जाते हैं. इससे वे इतने क्रोधित हो गये थे कि गालियाँ बकने लगते थे. कुछ प्रसाद मुझे भी मिल गया.

एक निर्मल परमात्मा का साधक चिता का मांस कैसे खा सकता है?

वस्तुतः यह इसके गुप्त स्तर को न समझकर बाजार में बिकने वाले घटिया तंत्र ग्रंथों के विवरण से लाभ उठाने वाले टीवी, सिनेमा और ड्रामे बाजों की देन है. इस मार्ग में चिता, चिता में जलते शरीर का मांस भक्षण, हड्डियों की माला, श्मशान आदि का अर्थ ही अलग है. बहुत से साधना करते है; पर वे उस चिता का मांस नहीं खाते. वे गुरु द्वारा निर्देशित चिता का मांस भक्षण करते रहते है और यह भक्षण सम्पूर्ण साधना काल में चलता रहता  है.

इन बातों के सिद्ध शास्त्र प्रमाण सिद्ध  ‘योगनी तन्त्र’, श्री विजय मालिनी तन्त्र, तंत्रालेक आदि ग्रन्थों में मिल जाएँगी. प्रत्यक्ष प्रमाण तो किसी अघोर साधक के मिलने पर ही प्राप्त होगा, बशर्ते कि वह आपसे बात करने के लिए तैयार हो. आपको गलियां देकर भगा ना दें. ये दुनियावी नहीं होते है. मैं जिनको जानता था, संगति की और कुछ साधनाये भी सीखी; वे लोग 30 वर्ष पहले मिले थे. वे उस स्थान पर अब नही है. अघोर परमात्मा है और परमात्मा ही परब्रह्म, शिव या ‘तत्व’ उपनिषद और गीता में कहा गया है. तत्त्व का भी अर्थ यही है. निमर्ल, अखंडित परम सार.

प्रेम कुमार शर्मा प्राचीन भारतीय विज्ञान एवं शास्त्र के शोधक हैं. इन्होने अपने जीवन के शुरुवाती साल पत्रकारिता में व्यतीत किये हैं. भारतीय प्राचीन विज्ञान, तंत्र, अघोर विद्या, समुद्रिकी, ज्योतिष और वास्तु पर इनकी 150 से भी अधिक पुस्तकें समस्त भारत में प्रकाशित होकर उपलब्ध हैं, जैसे - "रावन संहिता", "मृत्यु के बाद", "जीवन के बाद जीवन" इत्यादि.

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